✍️ लेख:
कभी-कभी ज़िन्दगी में ऐसे पल आते हैं जब हम बाहर से बहुत सफल दिखते हैं —
लोग हमें सम्मान देते हैं, हमारी उपलब्धियों की चर्चा करते हैं,
पर भीतर कहीं एक गहरी खाली जगह महसूस होती है।
मैं भी उस दौर से गुज़र रहा हूँ —
जहाँ दुनिया की नज़रों में मैं सफल हूँ,
पर अपनी ही नज़रों में शून्य महसूस करता हूँ।
कल मैंने विकास दिव्यकृति जी का एक वीडियो देखा —
👉 यहाँ वीडियो देखें
और सच कहूँ तो, उस एक वाक्य ने मेरे भीतर बहुत कुछ बदल दिया —
“जग को संभालने से पहले खुद को संभालो।”
यह वाक्य सुनकर जैसे दिल ने कहा —
हाँ, अब वक़्त आ गया है कि मैं खुद को समझूँ, खुद को स्वीकार करूँ।
जहाँ दर्द है, वहाँ रुकना नहीं;
जहाँ अपमान या तनाव है, वहाँ से निकलना सीखो।
क्योंकि जीवन दूसरों को साबित करने की दौड़ नहीं,
बल्कि खुद को जानने और शांति पाने की यात्रा है।
हम अक्सर अपने काम, अपने पद, या अपनी कमाई से
अपने मूल्य को मापने लगते हैं —
लेकिन असली मूल्य हमारे स्वभाव, कर्म और मन की स्थिरता में है।
आज मैंने ठान लिया है —
मैं अब दुनिया को नहीं,
पहले खुद को संभालूँगा।
जहाँ शांति मिलेगी, वहीं ठहरूँगा।
और हर नए दिन को एक नई शुरुआत की तरह जीऊँगा।
🌼 अंत में एक विचार:
"जो खुद को जीत लेता है, वह दुनिया को अपने आप जीत लेता है।"
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